Thursday, March 26, 2009

नया निर्देशक और नए विषय


संचार का सबसे प्रबल माध्यम ने जिस तरह करवट लिया है दर्शक भी उसी तरह ढल गया है। आज सिनेमा में जितना प्रयोग हो रहा है यकीनन उसमे नये प्रतिभाओ का हाथ है। पिछले १५ सालो से इंडस्ट्री में काम कर रहे अनुराग कश्यप को आज सफलता मिली है। अनुराग कश्यप एक नयी सोच बनाने की कोशिश की है यकीनन उसे साबित करने में समय लगेगा। लेकिन अपने दो फिल्मो से चर्चा में आए अनुराग आज इंडस्ट्री के सबसे व्यस्त निर्देशकों में है। देव डी के निर्दशन में अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए कहानी को स्ताफित करने में अपना समय ख़राब नही किया भारतीय दर्शक जो पहले से देवदास को जानता है उसके सामने कहानी को स्ताफित करने की ज़रूरत नही पड़ी । बस पात्रो को समझना पड़ा। इसके बाद सारा ध्यान कहानी को स्ताफित करने में ही लगा दिया। अनुराग की यह कोशिश उसकी चालाकी और नयी सोच का परिचायक है। कहानी का अंत बदलकर अनुराग नया प्रयोग करते हैं और फिर सफलता।

गुलाल फ़िल्म में इस्तेमाल की गए विविध प्रसंग इतिहास को दिखाते हैं। फ़िल्म को ५ बार देखा और हर बार कुछ नया पाया । अनुराग की सोच और उसकी दूरदर्शिता हर वक्त उसकी फिल्मों से झलकती है। शायद उसकी फ़िल्म आज के समाज को दिखाती है। समाज के रिश्तों को दिखाती है। गुलाल का हर प्रसंग अपने आप में कुछ नए विचारों को जन्म देता है हर प्रसंग महत्त्वपूर्ण है। दूर देश के टावर में घुस जाए एरोप्लेन नामक मुजरा काफ़ी अर्थो को स्पस्ट करता है। फ़िल्म में भी ऐसे कई प्रसग हैं ।

अनुराग की यह कामयाबी कई नए निर्देशकों को नये राह नए सोच की और ले जा रहा है उम्मीद की जा सकती है की नए निर्देशकों में कुछ नया करने की होड़ दर्शकों को अच्छी फिल्म देंगी।